nt, festivals, yoga, benefits of foods, homemade remedies, songs, story" /> father's day 21st june 2020 यह क्या है और वर्तमान स्थिति में एक रिपोर्ट जो बहुत ही रोचक जानकारी.... ~ life style health gyan

मंगलवार, 23 जून 2020

father's day 21st june 2020 यह क्या है और वर्तमान स्थिति में एक रिपोर्ट जो बहुत ही रोचक जानकारी....

Manoj kumar

पापा जैसा कोई नहीं

21 जून 2020 
           पापा तो सबके प्यारे होते हैं, अब अनूठे भी हो गए हैं. नए जमाने के पापा अब परवरिश की जिम्मेदारियां निभाने में ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जीवनसाथी की मदद कर रहे हैं. कल फादर्स डे है. इस मौके पर पापा की बदली भूमिका के बारे में आइए जानते हैं................

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                        पिताजी दिवस 21 जून 

सदियों से बच्चों के पालन-पोषण का जिम्मा आमतौर से माँ का ही माना जाता रहा है. इसीलिए शायद हमारे समाज में यह एक आम धारणा बन चुकी है कि ममता तो बस नारी का ही गुण है. पर आज इस धारणा को गलत साबित कर देने वाले कई पुरुषों के उदाहरण हमारे सामने हैं.

पुणे के आदित्य तिवारी ने तो इस मामले में मिसाल ही कायम कर दी. उन्हें इस साल वुमन्स डे पर ‘बेस्ट मम्मी ऑफ़ द वर्ल्ड’ का आवार्ड मिला है. आदित्य ने 2016 में डाउन सिंड्रोम के बच्चे अवनीश को गोद लिया. उस वक्त उनकी उम्र 28 साल थी. उनके नाम दुनिया का सबसे कम उम्र का पिता होने का भी रिकार्ड है. इसके लिए उन्हें एक लंबी क़ानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी. आदित्य की तरह आज आपको कोई ऐसे पिता मिल जाएँगे, जो पितृत्व की एक नई इबारत लिख रहे हैं. यह बदलाव उस समाज में हो रहा है, जहाँ कुछ दशक पहले पिता की भूमिका कमाने तक सीमित मानी जाती थी.

क्या कहते हैं शोध

अब परिवार में बच्चों की जिम्मेदारियों को पिता भी बराबरी से निभाते दिखते हैं. इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि पूरे समाज में भी स्त्री और पुरुष के बीच भूमिकाओं के मानक अब बदल रहें हैं. एक सर्वे की मानें तो पहले के वक्त के अनुशासनप्रिय, एकाकी और बाहर की दुनिया में व्यस्त रहने वाले पिता अब माओं की पसंद नहीं रहें. उसी सर्वे में परिवार में रोटी कमाने वाले सदस्य के तौर पर पुरुष की भूमिका को महिलाओं ने पिता की अहम भूमिकाओं वाली लिस्ट में आठवें नंबर पर रखा. मार्डन डैड्स: फादरहुड इन ए चेंजिंग वर्ल्ड नामक एक अन्य सर्वे में कुछ और दिलचस्प बातें निकलकर आई. उस सर्वे के अनुसार अब पुरुषों का अपनी भावनाओं को जाहिर करना कोई कमजोरी नहीं माना जाता. उस सर्वे में शामिल पुरुषों में से 86 फीसदी ने कहा कि वो चाहते है कि बच्चे उन्हें अपना दोस्त मानें, वों बच्चों की परवरिश में भावनात्मक रूप से शामिल होना चाहते हैं.

मजबूत हो रहा जुड़ाव :

आज के पिता अपने बच्चों की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी रहे. वो रात को नींद से उठकर रोते बच्चे को फिर से सुला रहे हैं. बच्चे को सुबह ब्रश कराने से लेकर स्कूल बस तक छोड़ने के काम काम कर रहे हैं. पेरेंट-टिचर की मीटिंग में जाते हैं, बच्चों की हॉबी में बराबर रूचि लेते हैं और ऑफिस से वापस आकर बच्चों के लिए वक्त भी निकाल रहे हैं. अब तसवीर पूरी तरह बदल चुकी है. इसका मजबूत अखबारों, सोशल मिडिया पर सेलिब्रेटी एकाउंट्स में भी मिल जाएगा.

सीखा रहे सेलिब्रिटी :

इस ट्रेड को दरअसल आम लोगों तक लाने का अधिकतर श्रेय तो सेलिब्रेटीज को ही जाता है. अब तुषार कपूर और करन जौहर सरीखे सेलेब्स को ही लीजिए. उम्र में चालीस का आकड़ा पार करते-करते उन्होंने सरोगेसी की मदद से अकेले के दम पर पिता बन बच्चों को पालने का फैसला किया. उनसे पहले से ही शाहरूख खान, हातिक रोशन, आमिर खान, संजय दत्त जैसे बड़ेअभिनेता अपने बच्चों से जुड़ाव के लिए उनके प्रशंसकों से तारीफ पा ही रहे थे. अपने बेटे के साथ टेनिस कोर्ट पर टेनिस खेलते हुए जब अभिनेता रितेश देशमुख ने तसवीर पोस्ट की, तो यह भी बच्चों और पिता के बीच नए दौर के मजबूत बन्धन की कहानी कहता है. 

किसी माँ से कम नहीं मुश्किलें :

आज के पिता खुद से क्या अपेक्षाएं रखते हैं, इसकी बानगी आपको अभिनेता इमरान हाशमी की किताब आपको अभिनेता इमरान हाशमी की किताब से आसानी से मिलेगी. वो अपनी किताब द किस ऑफ़ लाईफ में लिखते हैं, आपको इन दिनों एक सुपरहीरो पिता बनना होता है. चुनौतियों का सीधे सामना करो और मजबूत बनकर उसमें से निकलो. मेरे बच्चे ने मुझे जन्म दिया है. आज के पिता अपने बच्चों के लिए एकदम योद्धा की तरह तैयार दिखते हैं. इस राह पर चलने और सही-सलामत बाहर निकलने के लिए आपको सुपरहीरों के पावर की जरूरत होती है.’ एक सुखद बात ये भी हैं कि बच्चों के साथ आत्मीय रिश्ता जोड़ते ये पिता किसी शार्टकट की इच्छा करते हैं नहीं दिखते. ये बायकादा इसके लिए हर मुश्किल बदार्श्त करने को तैयार हैं. अब जैसे ऑफिस और करियर को ही लीजिए. सोशियोलॉजी की प्रोफेसर और सुपरडैड नामक किताब की लेखिका गेल कॉफमैन लिखती हैं, ‘नए सुपर डैड इस समय सबसे ज्यादा जूझते दिखाई देते हैं क्योंकि वे अपने बच्चों की जिन्दगी में रूचि लेना चाहते हैं, लेकिन काम और परिवार के बीच सन्तुलन बनाने में उन्हें मुश्किलें आती हैं. सुपरडैड अपने जीवन साथी का सच्चे मायनों में साथ निभाने की कोशिश करते हैं. वे ना सिर्फ अपना करियर, अपने बच्चे को ध्यान में रखते हुए मैनेजर करते हैं, बल्कि अपनी पत्नी को ध्यान में रखते हुए भी निर्णय लेते हैं.’

भावानाओं को कमजोरी नहीं मानते :

यह भी सच है कि सामाजिक मानकों में काफी बदलाव आया है. ऐसा नहीं है कि पिता की भूमिका निभा रहे पुरुषों में पहले संवेदनशीलता नहीं थी. फर्क शायद इनता है कि पहले पुरुषों  के लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सामजिक मानकों में शामिल नहीं माना जाता था. पर अब यह धारणा बदल चुकी है. यह भी है कि पहले बच्चों को पालने में ‘उन्हें ज्यादा लाड़ बिगाड़ देगा’ भी एक आम धारणा थी, जो अब पेरेटिंग के मामले में बिल्कुल अनुकूल नहीं मानी जाती. तो अब पता भी अपनी ममता को जाहिर करने में हिचक नहीं रहें हैं.

एकल परिवारों में बदल मिजाज :

एक ध्यान देने वाली बात ये भी है कि शहरों में रह रहे एकल परिवारों में माता-पिता दोनों ही कामकाजी हैं. तो परिवार को मैनेज करना और कमाई, मिल-जुलकर ही करनी होगी. अकेले तो किसी एक के वश का सारा काम है नहीं. फिर ज्वाइंट फैमिली भी नहीं है, जो अगर पिता ने ध्यान नहीं दिया, तो बच्चे की बुआ चाची, दादी सरीखा कोई ना कोई उसको देख ही लेगा. ऐसे में पिता बच्चे की कुछ जिम्मदारियां निभाकर एक सपोर्ट सिस्टम की कमी भी पूरा कर रहें है. यह भी एक कारण है कि घर में पिता, अब बच्चों की जिम्मेदारियों को लेकर ज्यादा सक्रिय और जुड़े दिखते हैं.

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