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गुरुवार, 30 जुलाई 2020

आप जहाँ खड़े हैं कदम वहीँ जमादें II happy life II happy life status II happy life status in hindi II positive life status in hindi II true lines about life in hindi II touching lines on life in hindi II happy life management II हैप्पी लाइफ स्टेटस इन हिंदी II हैप्पी लाइफ स्टेटस इन हिंदी II फीलिंग हैप्पी स्टेटस इन हिंदी II सबक सिखाने वाले स्टेटस

Manoj kumar

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कठिनाइयाँ कभी स्वागत करने योग्य तो नहीं होतीं पर वे हमारी जिन्दगी का अहम हिस्सा है. आप चाहें न चाहें, ये आकर रहती हैं. फ्रायड ने संकट के समय इन्सान की शोक-मनोदशा पर कहा कि इस दौरान कुछ लोग ठहर जाते हैं तो कुछ गहरे अवसाद में चले जाते हैं. केवल बाहरी ही नहीं, उनकी भीतरी दुनिया भी शोकमय हो जाती है. पर भीतर पैदा हुआ यह संकट बाहरी संकट से अधिक शक्तिशाली होता है. इसलिए जब कभी ऐसा दोतरफ़ा संकट महसूस करें तो आपको अपने ‘एटीट्यूड’ पर काम करना चाहिए. कई बार ऐसा होता है जब दुर्घटना को देखने का एक नजरिया भी बड़ी से बड़ी मुसीबत का रुख मोड़ सकता है. फ़िलहाल तो आपका यही नजरिया हो कि अभी जहाँ आप खड़े हैं, जिस स्थिति में है वहाँ पाँव जमाने का प्रयास करें. यह तो बेहद आसान है कि हम भविष्य की योजनाओं और अतीत के दिनों में झूलते रहें और विलाप में समय गँवा दें. वैसे, इसका अर्थ यह नहीं है कि भविष्य की योजना बनाना बंद कर दें पर अभी हमें इस संकट से उबरना है. इसके लिए जरूरी संसाधन इस पल में ही मिलेंगे. जब पल में कदम जमाने का अभ्यास करेंगे. जब पल में कदम ज़माने का अभ्यास करेंगे तो आपके एहसास, भावनाएं भी वहीँ रहने लगेंगी. भले ही आप असहाय और निराशा महसूस करें, यह अभ्यास करने से एक खास तरह की उर्जा महसूस होगी. याद रखें कि आप यह एक खास उद्देश्य से कर रहे हैं.


शनिवार, 25 जुलाई 2020

समाधान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है II जीवन को सरल कैसे बनाएं II जीवन को सफल बनाने के उपाय II happy life II live a happy life II khushi se kaise jiye

Manoj kumar

समाधान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है  II जीवन को सरल कैसे बनाएं II जीवन को सफल बनाने के उपाय II   happy life II  live a happy life II khushi se kaise jiye 

 jeevan kaise jeena chahiye in hindi II jivan kaise jina chahie II zindagi kaise jeena chahiye II zindagi ko behtar kaise banaye  II jeevan ko saral kaise banaye II how to live a happy life essay II how to live a positive happy life II how to be positive and happy II सफल जीवन का रहस्य
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समाधान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है:


इस उथल-पुथल भरे समय में यदि आप अपनी समस्या का हल तलाश रहे हैं तो सबसे जरूरी है खुद के प्रति सजग रहने की. इन्सान को छोड़कर किसी अन्य जीव के पास यह चीज नहीं. गौर करें, बीते दशकों में हमने प्रगति खूब हासिल की और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी. पर क्या वास्तव में अंदरूनी बन्धनों यानी संग्रह की इच्छा, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा आदि से आजाद हो सके हैं हम? यह आपको आध्यात्मिक सवाल लग सकता है लेकिन इसी आध्यात्मिकता में छिपा है हर मुश्किल का हल. यदि इस समय आप असुरक्षा डर से ले सकते हैं पर जब खुद पर मुसीबत आती है तो इस दौरान राह में आने वाले तमाम संकटों का सामना करने वाले भी जीवन की मुश्किलों का हल नहीं खोज पाते, क्योंकि अंदरूनी बन्धनों से आजादी पर विचार नहीं किया. यदि चिंता हद से अधिक बढ़ती है तो हो सकता है डॉ. दवा दें और आप कुछ समय के लिए ठीक हो जाए. अपने अंदरूनी बन्धनों की जकड़न को तोड़ने की शक्ति हमेशा हमारे पास है. बस अधीरता पर विजय पा लें, संकल्प मजबूत रखें. यह सब अपने जीवन के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ और ऐसे अनुभवों की कमी नहीं यहाँ.

क्या कर सकते हैं :

ü भौतिक साधनों से ख़ुशी को न जोड़ें, मुश्किल समय में अपने प्रयासों पर केन्द्रित रहें. 
ü अपने लिए नियमित रूप से कुछ समय जरूर निकालें. किसी शान्त जगह पर बैठें, मन की स्थिति पर तटस्थ होकर विचार करें. 
ü कोई मेंटर या गुरु जरूर हो, जिनसे मन की उलझन, चिंता शेयर कर सकें. 
ü प्रकृति से जुड़े. वायु-स्नान, घास पर नंगे पाँव चलना और इसे महसूस करना आदि जैसे प्रयास जीवन का स्वीकारने के लिए प्रेरित करेंगे.

सोमवार, 20 जुलाई 2020

पूर्वाग्रहों क्या है II पूर्वाग्रहों (Prejudice) से परेशान हैं तो करें ध्यान II पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता में अंतर II पूर्वाग्रह क्या है स्पष्ट कीजिए II पूर्वाग्रह को कम करने के उपाय II

Manoj kumar

पूर्वाग्रहों क्या है II पूर्वाग्रहों (Prejudice) से परेशान हैं तो करें ध्यान II पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता में अंतर II पूर्वाग्रह क्या है स्पष्ट कीजिए II पूर्वाग्रह को कम करने के उपाय II purvagrah kya hota hai II purvagrah in hindi II purvagrah ki visheshta II पूर्वाग्रह से ग्रसित





अमेरिका स्थित बॉल स्टेट यूनिवर्सिटी, इंडियाना की एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजिस्ट एडम ल्यूक द्वारा किए गए शोध के निष्कर्षों के मुताबिक़, पहले से ही औरों के बारे में राय बना लेना या रखना, निजी जीवन पर बुरा असर डाल सकता है. इससे आपके रिश्ते संकट में भी पड़ सकते हैं. यदि लगता है कि आप पूर्वाग्रह (Prejudice) मुक्त हैं तो जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही. दरअसल, पूर्वाग्रहों (Prejudices)  के बुरे प्रभावों से बचे रहना आसान नहीं. पर कुछ शोधों में यह पाया गया कि जो लोग नियमित ध्यान करते हैं, वे इस मुश्किल मनोदशा से बच सकते हैं. ध्यान करने से आप पूरी तरह पूर्वाग्रह (Prejudice) से मुक्त तो नहीं हो सकते पर ऐसी प्रवृत्तियों को कम करने में सहायता मिल सकती है. लन्दन की कनवेट्री यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर पीस ट्रस्ट एण्ड सोशल रिलेशन में एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी के प्रोफेसर मिगुल फारियास के मुताबिक, (पूर्वाग्रह को कम करने के उपाय) नियमित ध्यान के अभ्यास से विचारों पर नजर रखने में मदद मिल सकती है. मन में प्रेम और कल्याण भाव जगा सकती है.

शनिवार, 18 जुलाई 2020

नई शुरुआत के लिए चाहिए धीरज II how to do something step by step II how to do something step by step ideas

नई शुरुआत के लिए चाहिए धीरज II how to do something step by step II how to do something step by step ideas

कबीरदास ने करीब छा सौ साल पहले जो लिखा-कहा, उसका आज भी कोई तोड़ नहीं. हम उनको सीख को आधार बनाएं तो जीवन सरल जान पड़ेगा. खुद में यकीन जागेगा. कबीर की एक प्रचलित साखी है – ‘दुःख में सुमिरन सब करें और दुःख में करे न कोए, जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होए.’ यह हमने खूब सुना पर मंथन नहीं किया और परिणाम देख रहे हैं. यह दोहा केवल भक्ति की सीमित दृष्टि की बात नहीं करता बल्कि इसमें विस्तार है. इसमें प्रकृति भी शामिल है, इससे सामंजस्य बिगाड़ लिया तो आज बड़ा संकट झेल रहे हैं. अब ‘पॉजिटिव’ से दूर ‘निगेटिव’ के साथ रहने की नौबत आ गई (जोर से हंसते हैं) यानी जो संक्रमित हैं उनसे दूर और जो बचे हैं उनके साथ रहना है. पर प्रकृति इसी तरह अपना काम करती है. हमें भी बसअपना काम करना है. बस हम थोड़ा संयम रखें. सहज रहें. कबीर ने यहाँ भी (importance of patience) कह दिया – ‘सहज सहज सब कोई कहे सहज न जाने कोए’ जिन सहजे हरि मिले सहज जाने सोए’ यानी सहज रहें कहना आसान है समझना मुश्किल. ईश्वर ने जिस काम के लिए हमें भेजा है, बस वह कर लें तो हरि भी मिल जाएँगे. यह भी समझे कि अग्नि की प्रकृति जलाना है और यदि उसके पास खुद पहुँच जाएँगे तो वह नहीं बख्शेगी, जला देगी. आग यानी बाहर संक्रमण के खतरे को समझकर भी यदि निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, बिना काम के घर से बाहर जाएँगे, अपना ख़याल नहीं रखेंगे, समुचित सावधानी नहीं बरतेंगे तो सुरक्षित भी नहीं रह पाएंगे. भारत तो विश्वास और प्रार्थना का केन्द्र रहा है. हम आत्मसंतुलन और संयम से नई शुरुआत की तैयारी कर सकें, मैं यही प्रार्थना करता हूँ. 

शनिवार, 11 जुलाई 2020

डिजिटल फास्टिंग ये दूरी जरूरी है (digital fasting) digital detox II digital detoxification II digital detox benefits

Manoj kumar

डिजिटल फास्टिंग ये दूरी जरूरी है (digital fasting) digital detox

digital detox

                                                       digital fasting

एक रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन में लोगों का स्क्रीन टाइम पहले की तुलना में करीब दोगुना हो गया है.स्मार्टफोन का इस्तेमाल जहाँ पहले प्रति व्यक्ति औसतन 3 घंटे था, वो 5 घंटे तक चला गया. जिसमें 90% यूजर्स कन्टेन्ट स्ट्रीमिंग, ई-लर्निंग, इन्फोटेनमेंट और सोशल मिडिया जैसी डिजिटल गतिविधियों को अधिक समय दे रहें हैं. मनोरंजन के लिए वेब शोज या एप्स. नेटवर्किंग के लिए फेसबुक और ट्विटर. ऑफिस मीटिंग के लिए जूम. जब लॉकडाउन हुआ, तो मनोरंजन और काम करने के लिए इन्हीं माध्यमों पर हमने भरोसा किया. एक स्क्रीन से दूसरे स्क्रीन पर आते-जाते कैसे दिन बीतता चला गया, पता ही नहीं चला. इसमें कोई दोराय नहीं कि लॉकडाउन के दौरान तकनीक ने ही हमारे जीवन को सामान्य बनाने में मदद की. लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि जरूरत से ज्यादा तकनीक से चिपके रहने की आदत तनाव भी दे रही है. और ऐसे तकनीक के साथ सही तालमेल न बैठा पाने की वजह से हुआ है. अगर आप अपनी दिनचर्या पर गौर करें, तो पाएंगे कि एक दिन में आपने कितना समय स्क्रीन पर बिताया है. यहाँ तक कि रात को सोते समय भी हाथ में मोबाईल. नींद आती है सो जाते हैं.पर दिमाग अभी भी मोबाइल पर आ रहे नोटिफिकेशन में उलझा हुआ है, जिसे साथ में लेकर सोते रहते हैं. सुबह नींद तो खुलती है पर आधी. एक सप्ताह, दो सप्ताह या पूरा महीना. समय तो निकल रहा है, पर दिमाग की थकान बढ़ती जा रही है, जो तनाव, गुस्सा, अनिद्रा चिंता और निराशा के रूप में सामने आने लगी है. तभी तो आजकल आप ताजा महसूस नहीं कर रहे हैं. डिजिटल दुनिया में हर समय खोए रहना, न तो दिमाग के लिए अच्छा है, न ही आपको शरीर के लिए यह आदत ब्रेकअप, स्लीप डिसार्डर से लेकर डिप्रेशन तक की वजह बन सकती है.
भले ही तकनीक से दूरी कुछ घंटों के लिए हो, यह निश्चित रूप से चिंता से निपटने में मदद करता है. कई अध्ययनों ने यह भी पुष्टि की है कि सोशल मिडिया से दूरी एक व्यक्ति को खुश और कम तनावपूर्ण बना सकती है.

बढ़ रही है ‘वीडियो फटीग’ की समस्या digital detoxification :

तकनीक से लगातार जुड़े रहने से इन दिनों वीडियो फटिंगयानी वीडियो थकान की समस्या भी सामने आ रही है. दरअसरल, वर्क फ्राम होम की वजह से हम लैपटॉप, स्मार्टफोन या अन्य गैजेट्स के संपर्क में ज्यादा रहने लगे हैं. लगातार वीडियो मीटिंग या चैटिंग मानसिक और शारीरिक रूप से तनावग्रस्त कर सकते हैं. ‘वीडियो फटिंग’ शब्द का इस्तेमाल वर्चुअल मीटिंग और वीडियो चैट के अति प्रयोग के कारण सेहत खराब होने की भावना के लिए किया जा रहा है. ऐसे में आपको अपने लिए ‘डिजिटल डिस्टेंसिंग’ के कुछ नियम बनाने होंगे, ताकि आप अपनी ऊर्जा को बहाल करें और गैजेट्स से अपने जोखिम को सीमित करें. भले ही यह दिन में कुछ घंटों के लिए हो, यह निश्चित रूप से चिंता से निपटने में मदद करता है.

सन्तुलन बनाएँगे, तभी फायदे में रहेंगे :

मनोवैज्ञानिक भी मान रहे हैं, कि मोबाईल, लैपटॉप जैसे अन्य गैजेट्स से घिरे रहने के चलते इन दिनों लोगों में एक  तरह की बेचैनी बढ़ी है. ऑफिसियल ईमेल, सोशल मिडिया अपडेट के तनाव का असर रिश्तों पर भी पड़ रहा है. सुनने में यह भले अजीब लगे पर तकनीक से घिरे युवाओं के लिए डिजिटल फास्टिंग (digital fasting) यानी डीताक्स, एक बेहद अहम थेरेपी बनती जा रही है. हाल ही में कई बालीवुड हस्तियों ने भी अपने सोशल मिडिया अकाउन्ट्स बन्द कर दिए हैं. उनका यह फैसला उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छा माना जा सकता है, क्योंकि तकनीक और शोशल मिडिया का हमारी सेहत पर नाकारात्मक असर हो रहा है.

जरूरी है तकनीक में अनुशासन :

आपके कभी सोचा है कि घर के बड़े-बुजुर्ग कुछ ख़ास दिन नॉनवेज क्यों नहीं खाने देते. दरअसल, इसके पीछे कारण जीवन में अनुशासन लाना था, जिसे पारंपरिक नियम से जोड़ दिया. पर देखा जाए, तो इसमें सेहत की बात ही छिपी है, ताकि सप्ताह में कम-से-कम दो दिन गरिष्ठ भोजन से परहेज  किया जा सके. बस, यही फार्मूला आपको अपनी तकनीक से दूरी बनाने के लिए अपनाना होगा, क्योंकि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना आपके दिमाग के लिए धूम्रपान से भी अधिक खतरनाक हो सकता है, ऐसा एक शोध में बताया गया है.

इम्युनिटी बढ़ाएगी डिजिटल फास्टिंग (dijital fasting) :

जिस तरह से आप अपने वजन को कम करने के लिए एक निश्चित अंतराल पर डाइटिंग करते हैं, वैसे ही तकनीक से होने वाले तनाव को कम करने के लिए आपको डिजिटल डाइटिंग की जरूरत है. यह डाइटिंग आपकी शारीरिक और मानसिक इम्युनिटी psychology immunity को भी बढ़ाएगी, क्योंकि तकनीक से दूर रह कर आप अन्य काम पर अपना फोकस सोशल मिडिया के उपयोग को लगभग 30 मिनट रोजाना सीमित करने से अकेलेपन और अवसाद के लक्षणों में काफी सुधार हो सकता है. यह आपकी एकाग्रता में सुधार कर, आपके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ा सकता है. इससे अनिद्रा की समस्या धीरे-धीरे ठीक होने लगेगी. जिससे आप मानसिक (digital detox psychology) रूप से ज्यादा मजबूत और ज्यादा आशावादी महसूस कर पाएंगे.

मानने होंगे कुछ नियम digital detox essay :

चाहे वह ऑनलाइन शापिंग हो, नई भाषा सीखना हो या फिट रहना हो, इंटरनेट का इस्तेमाल तो बढ़ा ही है. अध्ययन बताते हैं कि कोरोना संकट के बीच, जहाँ इन्स्टाग्राम पर यूजर्स की एक्टिविटी दोगुना हुई, वहीँ मैंसेजर ग्रुप वीडियो कॉल में 70% और व्हाट्सएप पर 40% की वृद्धि देखी गई है. विशेषज्ञों की मानें तो जरूरत से ज्यादा तकनीक और सोशल मीडिया प्रेम शारीरिक और मानसिक समस्याओं को भी बढ़ने का मौका दे रहे हैं. इसलिए इसमें सन्तुलन बनाने की जरूरत है, जैसे : 
1.     सबसे पहले तो आपके कुछ समय यह सोचना चाहिए कि आप डिजिटल दिताक्स digital detox tips क्यों करना चाहते हैं? आपको यह ना करने पर क्या नुकसान हो रहे हैं? जब आप इन सभी बातों में स्पष्ट हो जाएँगे, तब आप खुद ही डिजिटल डीटाक्स (digital detox)  की ओर प्रेरित हो जाएँगे.

2.     एक नियम निर्धारित करें कि आप लंच के समय मोबाईल (mobile digital fasting) अपने पास नहीं रखेंगे. या फिर काम के दौरान व्यक्तिगत कॉल या मैसेज करने से बचेंगे. प्रोडक्टविटी बढ़ाने के साथ यह आपकी मानसिक शान्ति को बढ़ाएग. 
3.     हर दो-चार मिनट पर आने वाले नोटिफिकेशन हमें फोन चेक करने के लिए मजबूर करते हैं. इसलिए सोने से पहले अपने मेल, व्हाइट्सएप मैसेज आदि के अलर्ट या फेसबुक नोटिफिकेशन को बन्द कर दें. 
4.     मनोरंजन सिर्फ फोन या टीवी में ही है ऐसा नहीं है. आपअपनी पसंद का कोई काम करके भी अपना मनोरंजन कर सकते हैं, जैसे पेंटिंग, सिंगिंग कुकिंग आदि. यह आपको ज्यादा अच्छा महसूस कराएगा.

5.     सुबह-सुबह टहलना भी दिमाग की थकान को कम कर सकता है. दिन में कम से कम 30 मिनट के लिए पढ़ना आपकी एकाग्रता, नींद के पैटर्न में निश्चित रूप से सुधार कर कसता है.

6.     एक रिमांइडर सेट करें कि दिन में कितनी देर आपको स्क्रीन से दूर रहना है. कुछ ऐसी ही योजना आप सप्ताहांत के लिए भी बना सकते हैं, जो बिना तकनीक और बिना गैजेट्स के जीवन से ताल्लुक रखे.        

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

सादगी दिवस (12 जुलाई) simplicity day 12 July II हर सवाल का जवाब है सादगी II (sadagi divas) national simplicity day in india

Manoj kumar

सादगी दिवस (12 जुलाई) हर सवाल का जवाब है सादगी

सादगी दिवस (12 जुलाई) simplicity day (sadagi divas)

national simplicity day in india
सादगी दिवस

अमेरिका के मशहूर लेखक, कवि, पर्यावरणविद, इतिहासकार और दर्शनशास्त्री हेनरी डेविडथोरी के जन्मदिन (12 जुलाई, 1817) को ‘सिंपलिसिटी डे’ यानी सादगी दिवस के रूप में मनाया जाता है. उन्होंने दुनिया को ‘सादा जीवन’ जीने का सन्देश दिया था और सभी समस्याओं का हल इसे बताया. मैं बहुत कम इच्छाएँ रख सकता हूँ, मेरी सबसे बड़ी कुशलता यही है-हेनरी डेविड थोरी.

आपदा के कारण जिन्दगी की रफ्तार थमी तो ठहराव के दौर में इसे देखने का नजरिया भी बदलने लगा. क्या आपने गौर किया है कि सादा खानपान, रहन-सहन जो पहले मुश्किल था, अब जाने-अनजाने में दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा है. simplicity day (sadagi divas) मुश्किल जिन्दगी के बीच होने लगा है इसकी सादगी का भी एहसास. हर साल 12 जुलाई को अमेरिका में ‘सादगी दिवस’ मनाया जाता है, जबकि भारतीय संस्कृति और समाज का यह सर्वोच्च मूल्य है. क्यों जरूरी है सादगी, क्या हैं इसके फायदे, जानी-मानी हस्तियों से बातचीत के आधार पर बता रही हैं......
वे दिन खूब याद आ रहे हैं, जब सुबह से शाम तक काम और निजी जीवन के बीच सन्तुलन बनाने की होड़ मची रहती थी. ‘समय नहीं है’ का जुमला हर किसी की जुबान पर था. दुनियाभर में जीवन में ‘स्लोडाउन’ पर बात हुई. यानी भागमभाग वाली दिनचर्या को थोड़ा धीमा करना सीख जाएं तो आसान हो सकती है जिन्दगी. (national simplicity day in india) हम थोड़ा ठहरे, तब जाना कि इसकी जटिलताएँ तो हमने ही पैदा की हैं, जिन्दगी खुद में कितनी सरल और सादी है.

सॉफ्टवेयर इंजीनियर का कहती है, ‘जो बात हमें सालों से समझ में नहीं आ रही थी, उसे इस मुश्किल समय ने एक झटके में समझा दिया है.’ उनके मुताबिक ऐसा लग रहा है, जैसे जिन्दगी ‘बैक गियर’ में बहुत पीछे चली गई है, जब आधुनिक युग का ऐसा दबाव नहीं था और न ही ख्वाहिशों का बोझ था. इतनी ही सरल होनी चाहिए, जहाँ रोजाना आने वाला तमाम कठिनाइयों के बावजूद हम इनसे सब्र से निपटने का हौसला भी रख सकें. याद कीजिए, पिछली बार हमने कब झरोखे पर बैठने का सुख पाया. कब बारिश के बाद सोंधी मिट्टी की खुशबू को जरा रुककर महसूस किया. काढ़ा पीते हुए जिन्दगी की ऐसी सादगी का एहसास इससे पहले कब हुआ?

सरलता ही रखेगी एकाग्र : पिछली सदी के सत्तर के दशक में अमेरिका के मशहूर मनोवैज्ञानिक आब्राहम हेराल्ड मेसलों ने ‘मेसली पिरामिड’ का सिद्धांत दिया. इस के तहत इन्सान की मूलभूत जरूरतों का क्रम सजाया गया है. बताया गया कि इन जरूरतों को पूरा करने में क्रम में जीवन जटिलता की तरफ बढ़ता है. जैसे, सुरक्षा की आवश्यकता के तहत नौकरी की सुरक्षा, आमदनी की चिंता, सम्मान, शोहरत-इज्जत की जरूरत को इस सिद्धांत में रखा गया. ये वे आवश्यकताएं हैं, जो इन्सान को चालाकियों और झूठ बोलने के लिए उकसाती हैं. आत्मबोध यानि खुद की शान्ति चाहिए. यह भी एक जरूरत है, जो इन्सान पर रचनात्मक दबाव बनाए रखती है. national simplicity day in india पर कुछ लोग अपनी प्रतिभा और समझदारी के बल पर ऐसी जटिलताओं के बीच भी सादगी भरा जीवन चुन लेते हैं. बहुमुखी प्रतिभा के धनी फ़्रांस के एडवर्ड चार्ल्स मनोवैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री होने के साथ लेखक भी हैं. यहाँ उनका एक कथन प्रासंगिक है, ‘जटिल होने के बाद आपके प्रयास भी आपके विचलित कर देंगे. वहीँ, सरल रह सकेंगे तो आपका प्रयास भी केन्द्रित रहेगा यानी एकाग्र रह सकेंगे.’ जरा सोचिए रहेगा यानी एकाग्र रह सकेंगे.’ जरा सोचिए, परफेक्ट रहने की दौड़ और खुद पर दबाव डालते रहने की दौड़ और खुद पर दबाव डालते रहने की आदत ने जीवन को आसान बनाया या जटिल. आत्ममूल्यांकन करने का इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता.

ये जंग होगी आसान : ‘आसान नहीं सरल है जिन्दगी, बस हमें इसे इतना सरल रखना है, जितना रख सकें. उन अपेक्षाओं के पीछे न दौड़ें, जो मन शान्ति हर लें. सरल रहें और खुद को पूरी तरह स्वीकार करें.’ इन दिनों अपने इन्स्टाग्राम पोस्ट से सकारात्मक का संचार करने में जुटी हैं अंकित कंवर. वे अभिनेता मिलिंद सोमन की पत्नी होने के साथ-साथ अपनी एक अलग पहचान रखती हैं. उनके मुताबिक, सादगीपूर्ण गिन्दगी संभव है, यदि हम नकारात्मकता के बीच भी अपने विचारों को सकारात्मकता के बीच भी अपने विचारों को सकारात्मक की ओर ले जाने का अभ्यास करें. सोशल मिडिया पर हजारों प्रशंसकों को वीडियो और फोटो के जरिए जिन्दगी से जोड़ने वाले सेलिब्रेटीज की लंबी फेहरिस्त है यहाँ. वे बिना मेकअप सादगी भरी अपनी तस्वीरों और अनुभवों के जरिए नकारत्मक हो रहे माहौल में भर रहे हैं सकारात्मक रंग. हाल ही में मशहूर भरतनाट्यम नृत्यांगना गीता चंद्रन के परिवार सहित कोविड-19 संक्रमित होने की खबर उदास करने वाली थी, पर वे सभी विजेता बनकर लौटे. उनकी नृत्यांगना बेटी शरण्या चंद्रन ने अपनी फेसबुक पोस्ट में बताया कि कैसे इस जंग को उन्होंने सादगी और मानिसक मजबूती के बल पर जीत लिया.

जब सादगी को अपना लेते हैं आप.....

üसेहत सर्वोच्च प्राथमिकता होती है. इस पर एकाग्र रहते हैं, तनाव भी कम होता  है. 
üभविष्य की प्रवाह करते हैं पर वर्तमान को भरपूर जीना एकमात्र शर्त मानते हैं. आप अपने आज को खतरे में नहीं रखना चाहते. 
üबजट को जरूरी मानते हैं. आप अपने आज को खतरे में नहीं रखना चाहते. 
üबजट को जरूरी मानते हैं. इस पर पूरे भरोसे के साथ काम करते हैं. आपको समझौते के कम करने पड़ते हैं. 
üजरूरतें अधिक नहीं बढ़ाते और वही खरीदते हैं जो आवश्यकताओं से जुड़ी हों. 
üसच्चाई के करीब रहते हैं और अति प्रतिक्रियावादी होने से बचते हैं. निर्णय समझदारी से भरा होता है. 
üआपके रिश्ते गहरे और अर्थपूर्ण होते हैं. ये कर्तव्यों को पूरा करने पर केन्द्रित होते हैं, किसी को प्रभावित करने के उद्देश्य पर नहीं. 
üसरल चीजों में आनन्द लेते हैं. जैसे- टहलना, बादलों को निहारना या और कोई भी काम, जो आप कर रहे हैं. गैरजरूरी चीजों पर ध्यान नहीं देने के कारण आपकी मानसिक शान्ति अपेक्षाकृत अधिक होती है. खुद का खयाल रखते हैं. गैजेट या अन्य भौतिक वस्तुओं को लेकर उलझे नहीं रहते. आप अपने ऊपर महत्वाकांक्षाओं को हावी नहीं होने देते.

बुधवार, 8 जुलाई 2020

घर की सेहत से जुड़ी है आपकी ख़ुशी II house design

Manoj kumar

घर की सेहत से जुड़ी है आपकी ख़ुशी

house design
house design

प्राकृतिक रौशनी में है :

ऐसा कहा जाता है कि जिस घर में प्राकृतिक रोशनी यानी सूर्य का प्रकाश नहीं जाता, वहाँ डॉ. जाता है. तो अगर आप घर में रहते हुए उर्जावान महसूस करना चाहते हैं, तो सुबह-सुबह खिड़कियों को खोल दें, ताकि घर में ज्यादा से ज्यादा सूर्य की किरणें प्रवेश कर सकें. शोधों में सूर्य की रोशनी को प्राकृतिक कीटाणुनाशक के रूप में जाना जाता है. यह आपके घर में पनपने वाले कीटाणुओं को मारने का काम करती है. तो इसे नेचुरल एंटीसेप्टिक रोशनी को घर में आने दें. वेलनेस आर्किटेक्चर श्रेयबिस स्मिथ कहते हैं, ‘अपने घर में सूरज की रोशनी को आने देने का मतलब है अपनी सेहत को बढ़ाना. इसलिए हम घरों में खिड़कियों को इस तरह बनाते हैं कि सभी कोनों में दिन के उजाले का प्रवेश हो, क्योंकि यही रोशनी आँखों की सेहत के साथ स्वस्थ हार्मोन उत्पादन में भी मदद करती है.’

ताजा हवा घर में बैठने दें:

शोध बताते हैं कि घर के अंदर की हवा बाहरी हवा की तुलना में अधिक प्रदूषित होती है. इसलिए अपने घर को डीटैक्सिफाई करना जरूरी  है. रोजाना सुबह-सुबह खिड़की खोल दें, ताकि अंदर की दूषित हवा की निकासी हो. इंटीरियर डिजाइनर लिंच-स्पार्क्स हवा से विषाक्त पदार्थों को दूर करने के लिए स्नेक प्लांट और एलोवेरा लगाने की सलाह देते हैं.

इसलिए घर से बाहर खोलें जूते :

जूतों को घर से बाहर खोलना, सिर्फ कीटाणुओं को बाहर रखने के लिए अच्छा नहीं है, बल्कि यह आपके घर को सुरक्षित रखने में भी मदद कर सकता है. ह्यूस्टन यूनिर्वसिटी शोधकर्ताओं का मानना  है कि बाहर से आने वालेजूते में मौजूद जर्म्स दस्त और पेट में ऐंठन का कारण हो सकते हैं. इसलिए 36% अमेरिकी अपने जूते घर से बाहर ही निकाल देते हैं, क्योंकि वे जूते के साथ अंदर आने वाले विषाक्त पदार्थों के बारे में जानते हैं.

कैसा है प्राकृतिक परिवेश :

अपना स्वास्थ्य चाहते है, तो उसे जगह में सुधार करना शुरू कर दें. जहाँ आप रहते हैं. अध्ययन बताते हैं कि एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण तनाव कम करता है और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण लाता है. अगर आप अपने मूड को ठीक रखना चाहते हैं, तो घर में प्रकृति का एहसास कराने वाले साज-सज्जा को प्राथमिकता दें. envronmental हेल्थ सर्विस की असोसिएट डायरेक्ट डॉ. रेबेक ब्रुहल मानती हैं कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए घर और परिवेश को सही रखना जरूरी है, जैसे कि हरियाली को जगह देना.

घर में लाए रोशनी की ख़ुशी :

जब बात मुड को ठीक करने को हो, तो घर के अंदर की लाईट यानी रोशनी भी आपके लिए जादू का काम कर सकती है. यदि आपको चिंता और डिप्रेशन की समस्या है, तो बेहतर होने के लिए कमरे में हीलिंग वाली लाईट्स की व्यवस्था करें, जैसे हिमालयन साल्ट लैंप्स. इसके भीतर एक बल्ब जलता है, जिससे निकलने वाली गुलाबी रोशनी मूड को बेहतर बनाने का काम करती है.

अपनी तकनीक को सीमित करें:

घर में इलेक्ट्रानिक गैजेट्स के इस्तेमाल को लेकर आपको कुछ सीमाएँ बनानी होंगी है, क्योंकि इससे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे हमारे स्वास्थ्य लिए नुकसानदेह हैं. इसके प्रभाव को कम करने के लिए जहाँ आप काम करते हैं, उस कमरे में क्रिस्टल की चीजें रखें. इंटीरियल वेलनेस डिजाइनर सोफिया गुशी इसके लिए क्रिस्टल, पौधे आदि रखने की बात करती हैं, क्योंकि ये विद्दुत चुम्बकीय क्षेत्र को बेहतर करने का काम करते हैं.   

बुधवार, 1 जुलाई 2020

ख़ुशी पाने का एक साधन है करुणा II Compassion is a means to attain happiness

Manoj kumar

ख़ुशी पाने का एक साधन है करुणा

करुणा आपको यह समझने में मदद करती है कि दूसरे क्या महसूस कर रहे हैं. साथी ही आपको दूसरों की मदद करने और अपने दुखों को दूर करने के लिए भी भी प्रेरित करती है. इसलिए हमें अपने अंदर करुणा और दया भाव को बढ़ावा देना चाहिए. ये कुछ तरीके हैं, जो आपकी मदद कर सकते हैं......
ख़ुशी पाने का एक साधन है करुणा II  Compassion is a means to attain happiness, khush kaise rahe
खुश कैसे रहे

अपने जीवन में करुणा क्यों विकसित करें? इस पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन सुझाव देते हैं कि करुणा का अभ्यास करने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन कार्टिसोल का उत्पद्न२३ फीसदी कम हो जाता है, वहीँ उम्र बढ़ने  की प्रक्रिया को धीमा करने वाले हार्मोन का उत्पादन सौ फीसदी बढ़ जाता है. करुणा आपको दूसरों से जोड़ती ही नहीं है, बल्कि आपकी ख़ुशी को बढ़ाने का भी काम करती है. इसलिए आप अपने जीवन में करुणा और दया भाव को आने दें.
1. हमेशा चीजों को अच्छे या बुरे के रूप में लेबल करने के बजाय उन्हें महसूस करने पर ध्यान केन्द्रित करें. जब आप दूसरों को आंकना बंद करेंगे, तो आप खुद ही अधिक दयावान बन जाते हैं. जरूरी नहीं कि आपके आसपास के लोग आपकी उम्मीद पर रख उतरें. ऐसे में खुद को यह याद दिलाते रहना ठीक होगा कि हर कोई अपना सर्वश्रेष्ठ कर रहा है, जिसमें आप खुद भी शामिल हैं. अगर आप खुद को जज करते रहेंगे, तो संभव है आप हमेशा दूसरों को भी जज करते रहेंगे. तो पहले खुद पर यह अभ्यास करें. धीरे-धीरे आप दूसरों के प्रति भी अधिक दयावान बन जाएगी.
2. दूसरों को सुनने का भी अभ्यास करें. जब आप दूसरों को सुनने के लिए समय निकालते है, तो आप उस व्यक्ति से उसी भावना से जुड़ते है, जो हम सभी में मौजूद है. आप खुद को दूसरे व्यक्ति में देखते हैं. इस तरह जब आप करुणा के लिए अपना दिल खोलते हैं, तो उपचार के लिए स्वयँ एक जरिया भी बन जाते हैं.
3. रोजाना माइंडफुलनेस का अभ्यास करें. जब आप लोगों के आसपास हो, तब वहाँ मौजूद रहने की कोशिश करें. उनके साथ संवाद करते हैं, तो लोगों की आँखों में देखें. इससे आपको उन्हें बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी. जब आप एकाग्रता और फोकस के साथ किसी व्यक्ति को गैर से देखेंगे, तो आपको उनके हाव-भाव, उनके शब्दों में गहराई नजर आएगी. कई चीजें महसूस होंगी, जो वे व्यक्ति भी नहीं कर सकते हैं. इससे आप समझ पाएँगे कि वे क्या महसूस कर रहें हैं. आप उनकी जरूरतों के लिए अपना दिल खोलेंगे और उनकी मदद करने के लिए हर संभव कोशिश करेंगी.
 जब आप दूसरों के साथ विनम्रता और मधुरता से बात करते हैं, तो आप स्वतः ही उनके अंतर्मन से जुड़ कर उनसे नाता जोड़ लेते हैं. इसलिए करुणा को विकसित करने के लिए आपके अंदर विनम्रता का साथ होना भी जरूरी है. किसी की मदद करने से पहले हमेशा अपने आप से पूछें कि अगर उनकी जगह पर होते, तो आप किसी से क्या उम्मीद करते है.
फिर जो कुछ भी आपकी क्षमता में है, उसे निस्वार्थ भाव से करने की कोशिश करें. दयालुता के छोटे-छोटे काम भी आपको दयालु बनाने में के लंबा रास्ता तय करेंगे. दूसरी चीज, जो हमें और दयावान बनाएगी वह है क्षमा. अगर आपको यह मुश्किल लगता है, तो कम से कम एक मजूबत इरादा बनाइए कि आप क्षमा करेंगे और क्षमा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. जब आप ऐसा करेंगे, तो आपको दूसरों को माफ़ करने की ताकत मिलेगी. 
4.  ‘हेलो! आप कैसे हैं?’ दूसरों से मिलने के इन सामान्य तरीकों से हम सभी परिचित हैं. आइए अब हम दूसरों से मानसिक रूप से बातचीत करने का एक नया तरीका अपनाएं-एक गहरी साँस लें और अपनी बातचीत शुरू करने से पहले या उस व्यक्ति के बारे में सोचते हुए, मानसिक रूप से दोहराए, ‘मैंआपके सुख की दुआ करता हैं.’ जब आप हर किसी को आशीर्वाद देने की आदत में पड़ जाते हैं, तो आप हमेशा सच्चाई को पहचान पाएंगे. आपके पूर्वाग्रह या पहले से बनी धारणाएँ आपके विचारों या कार्यों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं रहेंगी और करुणा भाव उपजेगा.

मंगलवार, 23 जून 2020

father's day 21st june 2020 यह क्या है और वर्तमान स्थिति में एक रिपोर्ट जो बहुत ही रोचक जानकारी....

Manoj kumar

पापा जैसा कोई नहीं

21 जून 2020 
           पापा तो सबके प्यारे होते हैं, अब अनूठे भी हो गए हैं. नए जमाने के पापा अब परवरिश की जिम्मेदारियां निभाने में ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जीवनसाथी की मदद कर रहे हैं. कल फादर्स डे है. इस मौके पर पापा की बदली भूमिका के बारे में आइए जानते हैं................

father's day 21st june 2020 यह क्या है और वर्तमान स्थिति में एक रिपोर्ट जो बहुत ही रोचक जानकारी...., dadi day
                        पिताजी दिवस 21 जून 

सदियों से बच्चों के पालन-पोषण का जिम्मा आमतौर से माँ का ही माना जाता रहा है. इसीलिए शायद हमारे समाज में यह एक आम धारणा बन चुकी है कि ममता तो बस नारी का ही गुण है. पर आज इस धारणा को गलत साबित कर देने वाले कई पुरुषों के उदाहरण हमारे सामने हैं.

पुणे के आदित्य तिवारी ने तो इस मामले में मिसाल ही कायम कर दी. उन्हें इस साल वुमन्स डे पर ‘बेस्ट मम्मी ऑफ़ द वर्ल्ड’ का आवार्ड मिला है. आदित्य ने 2016 में डाउन सिंड्रोम के बच्चे अवनीश को गोद लिया. उस वक्त उनकी उम्र 28 साल थी. उनके नाम दुनिया का सबसे कम उम्र का पिता होने का भी रिकार्ड है. इसके लिए उन्हें एक लंबी क़ानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी. आदित्य की तरह आज आपको कोई ऐसे पिता मिल जाएँगे, जो पितृत्व की एक नई इबारत लिख रहे हैं. यह बदलाव उस समाज में हो रहा है, जहाँ कुछ दशक पहले पिता की भूमिका कमाने तक सीमित मानी जाती थी.

क्या कहते हैं शोध

अब परिवार में बच्चों की जिम्मेदारियों को पिता भी बराबरी से निभाते दिखते हैं. इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि पूरे समाज में भी स्त्री और पुरुष के बीच भूमिकाओं के मानक अब बदल रहें हैं. एक सर्वे की मानें तो पहले के वक्त के अनुशासनप्रिय, एकाकी और बाहर की दुनिया में व्यस्त रहने वाले पिता अब माओं की पसंद नहीं रहें. उसी सर्वे में परिवार में रोटी कमाने वाले सदस्य के तौर पर पुरुष की भूमिका को महिलाओं ने पिता की अहम भूमिकाओं वाली लिस्ट में आठवें नंबर पर रखा. मार्डन डैड्स: फादरहुड इन ए चेंजिंग वर्ल्ड नामक एक अन्य सर्वे में कुछ और दिलचस्प बातें निकलकर आई. उस सर्वे के अनुसार अब पुरुषों का अपनी भावनाओं को जाहिर करना कोई कमजोरी नहीं माना जाता. उस सर्वे में शामिल पुरुषों में से 86 फीसदी ने कहा कि वो चाहते है कि बच्चे उन्हें अपना दोस्त मानें, वों बच्चों की परवरिश में भावनात्मक रूप से शामिल होना चाहते हैं.

मजबूत हो रहा जुड़ाव :

आज के पिता अपने बच्चों की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी रहे. वो रात को नींद से उठकर रोते बच्चे को फिर से सुला रहे हैं. बच्चे को सुबह ब्रश कराने से लेकर स्कूल बस तक छोड़ने के काम काम कर रहे हैं. पेरेंट-टिचर की मीटिंग में जाते हैं, बच्चों की हॉबी में बराबर रूचि लेते हैं और ऑफिस से वापस आकर बच्चों के लिए वक्त भी निकाल रहे हैं. अब तसवीर पूरी तरह बदल चुकी है. इसका मजबूत अखबारों, सोशल मिडिया पर सेलिब्रेटी एकाउंट्स में भी मिल जाएगा.

सीखा रहे सेलिब्रिटी :

इस ट्रेड को दरअसल आम लोगों तक लाने का अधिकतर श्रेय तो सेलिब्रेटीज को ही जाता है. अब तुषार कपूर और करन जौहर सरीखे सेलेब्स को ही लीजिए. उम्र में चालीस का आकड़ा पार करते-करते उन्होंने सरोगेसी की मदद से अकेले के दम पर पिता बन बच्चों को पालने का फैसला किया. उनसे पहले से ही शाहरूख खान, हातिक रोशन, आमिर खान, संजय दत्त जैसे बड़ेअभिनेता अपने बच्चों से जुड़ाव के लिए उनके प्रशंसकों से तारीफ पा ही रहे थे. अपने बेटे के साथ टेनिस कोर्ट पर टेनिस खेलते हुए जब अभिनेता रितेश देशमुख ने तसवीर पोस्ट की, तो यह भी बच्चों और पिता के बीच नए दौर के मजबूत बन्धन की कहानी कहता है. 

किसी माँ से कम नहीं मुश्किलें :

आज के पिता खुद से क्या अपेक्षाएं रखते हैं, इसकी बानगी आपको अभिनेता इमरान हाशमी की किताब आपको अभिनेता इमरान हाशमी की किताब से आसानी से मिलेगी. वो अपनी किताब द किस ऑफ़ लाईफ में लिखते हैं, आपको इन दिनों एक सुपरहीरो पिता बनना होता है. चुनौतियों का सीधे सामना करो और मजबूत बनकर उसमें से निकलो. मेरे बच्चे ने मुझे जन्म दिया है. आज के पिता अपने बच्चों के लिए एकदम योद्धा की तरह तैयार दिखते हैं. इस राह पर चलने और सही-सलामत बाहर निकलने के लिए आपको सुपरहीरों के पावर की जरूरत होती है.’ एक सुखद बात ये भी हैं कि बच्चों के साथ आत्मीय रिश्ता जोड़ते ये पिता किसी शार्टकट की इच्छा करते हैं नहीं दिखते. ये बायकादा इसके लिए हर मुश्किल बदार्श्त करने को तैयार हैं. अब जैसे ऑफिस और करियर को ही लीजिए. सोशियोलॉजी की प्रोफेसर और सुपरडैड नामक किताब की लेखिका गेल कॉफमैन लिखती हैं, ‘नए सुपर डैड इस समय सबसे ज्यादा जूझते दिखाई देते हैं क्योंकि वे अपने बच्चों की जिन्दगी में रूचि लेना चाहते हैं, लेकिन काम और परिवार के बीच सन्तुलन बनाने में उन्हें मुश्किलें आती हैं. सुपरडैड अपने जीवन साथी का सच्चे मायनों में साथ निभाने की कोशिश करते हैं. वे ना सिर्फ अपना करियर, अपने बच्चे को ध्यान में रखते हुए मैनेजर करते हैं, बल्कि अपनी पत्नी को ध्यान में रखते हुए भी निर्णय लेते हैं.’

भावानाओं को कमजोरी नहीं मानते :

यह भी सच है कि सामाजिक मानकों में काफी बदलाव आया है. ऐसा नहीं है कि पिता की भूमिका निभा रहे पुरुषों में पहले संवेदनशीलता नहीं थी. फर्क शायद इनता है कि पहले पुरुषों  के लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सामजिक मानकों में शामिल नहीं माना जाता था. पर अब यह धारणा बदल चुकी है. यह भी है कि पहले बच्चों को पालने में ‘उन्हें ज्यादा लाड़ बिगाड़ देगा’ भी एक आम धारणा थी, जो अब पेरेटिंग के मामले में बिल्कुल अनुकूल नहीं मानी जाती. तो अब पता भी अपनी ममता को जाहिर करने में हिचक नहीं रहें हैं.

एकल परिवारों में बदल मिजाज :

एक ध्यान देने वाली बात ये भी है कि शहरों में रह रहे एकल परिवारों में माता-पिता दोनों ही कामकाजी हैं. तो परिवार को मैनेज करना और कमाई, मिल-जुलकर ही करनी होगी. अकेले तो किसी एक के वश का सारा काम है नहीं. फिर ज्वाइंट फैमिली भी नहीं है, जो अगर पिता ने ध्यान नहीं दिया, तो बच्चे की बुआ चाची, दादी सरीखा कोई ना कोई उसको देख ही लेगा. ऐसे में पिता बच्चे की कुछ जिम्मदारियां निभाकर एक सपोर्ट सिस्टम की कमी भी पूरा कर रहें है. यह भी एक कारण है कि घर में पिता, अब बच्चों की जिम्मेदारियों को लेकर ज्यादा सक्रिय और जुड़े दिखते हैं.

बुधवार, 10 जून 2020

अनलॉक-1 की पाबंदियों में प्यार से करे बच्चों से बात

Manoj kumar

प्यार से करे बच्चों से बात

अनलॉक-1 की पाबंदियों में छोटे बच्चे घरों में हैं. ऐसे में माहौल के हिसाब से उनके सवालों और शरारतों के हिसाब से उनके सवालों और शरारतों को सही ढंग से संभालना है आपकी जिम्मेदारी........
अनलॉक-1 की पाबंदियों में प्यार से करे बच्चों से बात, children
children

कोरोना संक्रमण में जारी गाइडलाईन के चलते अनलॉक-1 में भी छोटे बच्चे घर से बाहर नहीं निकल रहे हैं. घर में रहने के कारण बच्चों का शारीरिक गतिविधि में भाग न लेना और मोबाईल या टीवी की स्क्रीन से चिपककर समय बिताना पैरेंट्स के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है. एक्सपर्ट मानते हैं कि इस दौर में आप असरदार ढंग से बातचीत कर बच्चों पर गहरा असर डाल सकते हैं. कुछ ऐसी बातें हैं, उनसे कभी नहीं कहनी चाहिए.

जाहिर करे दुलार:

बच्चों से ‘आई लव यू’ कहने से कभी मत हिचकिचाइए. इन तीन जादुई शब्दों का असर कभी गलत नहीं हो सकता है. बच्चों से प्यार आपके कामों से भी झलकना चाहिए. बच्चों के साथ समय बिताइए. उनके साथ बातचीत कीजिए. यह मत कहिए, ‘ओह, तुमने तो मुझे पागल कर दिया है.’

गलतियों से सबक लेना सिखाएँ :

बच्चों को ‘न’ कहने की जगह कहिए, ‘चलो इस काम को इस तरीके से कहते हैं.’ अगर बच्चा कुछ गलत करता है तो ‘तुम बड़े शरारती हो’ या ‘हर समय कोई न कोई चीज ख़राब करते रहते हो’, बिल्कुल मत बोलिए. इसकी जगह आप कह सकते हैं, ‘हर कोई गलती कर सकता है. कोई भी परफेक्ट नहीं होता है.’
अनलॉक-1 की पाबंदियों में प्यार से करे बच्चों से बात, children
बच्चे

माफ़ी मांगने में न झिझकें :

बच्चों की शरारतों पर हमारा कई बार गुस्से पर कोई कंट्रोल नहीं रहता. हम उन्हें बुरी तरह से डांट-फटकार देते हैं. जिससे उन पर गलत असर पड़ता है. अगर आपको लगता है कि अपने कुछ गलत किया है तो आपकी माफ़ी मांगना उन पर अच्छा असर डालेगा. इसी तरह किसी मुसीबत के समय बच्चे से कहना, ‘सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह तो किसी के साथ भी हो सकता है’, बच्चों में हालात से मुकाबले करने की हिम्मत पैदा करता है और उनके मन में यह विश्वास पैदा होता है और उनके मन में यह विश्वास पैदा होता है कि संभलने के भी मौके होते हैं. 

बच्चों से यह कभी मत कहिए :

‘मैं तुम्हारे लिए यह काम करना बर्दास्त नहीं कर सकता. मैं किस तरह तुम्हारी ख्वाहिशें पूरी कर रहा हूँ.’ इस तरह की बातें कभी नहीं कहनी चाहिए. इसकी जगह उन्हें समझाएं कि आप पैसों की बचत इसलिए कर रहें हैं ताकि उसे अच्छी शिक्षा दिला सकें. बच्चों पर सकारात्मक असर डालने वाले शब्दों का प्रयोग करें. सही पालन पोषण से बच्चे समझदार व्यक्ति बनने की दिशा में अग्रसर होते हैं