nt, festivals, yoga, benefits of foods, homemade remedies, songs, story" /> life style health gyan : पर्व त्यौहार

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सोमवार, 3 अगस्त 2020

रक्षा बंधन पर्व में मुक्ति का पर्व II रक्षा बंधन पर्व पर निबंध II रक्षा बंधन पर निबंध in Hindi II रक्षा बंधन पर 10 लाइन निबंध II रक्षाबंधन का निबंध हिंदी में II रक्षाबंधन का महत्व II रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व II रक्षाबंधन का ऐतिहासिक महत्व II raksha bandhan 2020 in india

Manoj kumar

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सूत रेशम का मात्र एक धागा भाई-बहन को न 

सिर्फ प्रेम और सम्मान के बन्धनों में बंधता है, 

बल्कि इसके जरिए मुक्ति का एहसास भी जगा 

देता है. रक्षा की उदात्त भावना के जरिए आपसी 

प्रेम का एक भयमुक्त सुन्दर संसार रचता है....

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                       रक्षा बंधन



संसार जब भारत की ओर देखता है तो उसे धार्मिक चेतना और सांस्कृतिक चेतना के दो ऐसे शिखर दिखाई देते हैं, जिनका मुकाबला संसार में कहीं नहीं हो सकता. धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में भारत ने जो कुछ पाया है, वह अद्भुत है. शायद यही कारण है कि आज संसार भौतिक उत्थान के शीर्ष पर पहुंचकर भी जब जीवन का मर्म जानना चाहता है तो वह भारत की ओर ही देखता है. धर्म और संस्कृति के आयाम तो अनेक हैं, लेकिन प्रसंग श्रावणी पर्व रक्षाबंधन का है तो क्यों न हम भी धर्म और संस्कृति के इस आनन्द प्रसंग पर ही कुछ देर ठहरकर इसे निहार लें, ताकि कुछ रेशम और सूत के धागे अपनी कथा कह सकें.


श्रावणी पर्व या रक्षा बन्धन से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं, पर जो कथाएँ हम बहुधा सुनते हैं, उनमें पहली है कृष्ण और द्रौपदी की. कहते हैं, एक बार जब भगवान कृष्ण युद्धरत थे, तब उनके हाथ से सुदर्शन चक्र इतनी गति से छूता कि उनकी अंगुली से रक्त बहने लगा. तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर उसे भगवान कृष्ण की अंगुली में बांधा था और यही वह सूत्र था, जिसके कारण बाद में चीरहरण के वक्त द्रौपदी की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण दौड़े चले आए थे.


दूसरी कहानी देवराज इन्द्र, देव गुरु बृहस्पति और इद्रानी की भी है. कहते हैं असुरों से संग्राम में इन्द्र जब घबराकर देव गुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथ पर बांधा था और देवराज इन्द्र उसके बाद युद्ध में विजयी हुए थे. कुछ कहानियाँ इतिहास से भी जुड़ी हुई है, जिनमें एक कहानी मेवाड़ की रानी की भी है, जिन्होंने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी थी और और हुमायूँ भी इस राखी का मान रखते हुए अपनी राजपूत बहन की सहायता के लिए तुरन्त आ गए थे.के प्रसंग हमारी आजादी की लड़ाई से जुड़ा हुआ है, विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने सन 1905 में बंगभंग के विरोध में रक्षा बन्धन को नया रूप देते हुए इसी दिन बंगाल की जनता को विरोध करने के लिए घरों से निकलने के लिए कहा था. विरोध की शुरुआत सभी धर्म के लोगों ने एक-दूसरे के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधकर की थी.


श्रावणी पर्व रक्षा बन्धन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है उपाकर्म अर्थात गुरु-शिष्यों के जुड़ाव के साथ अध्ययन-अध्यापन की शुरुआत. उपाकर्म के तीन हिस्से होते हैं. पहला प्रायश्चित, जिसमें किसी नदी या सरोवर के तट पर शिष्य अपनी समस्त त्रुटियों के लिए प्रायश्चित करता है. स्नान के उपरान्त उपाकर्म का दूसरा हिस्सा फलित होता है, जिसे हम संस्कार के रूप में जानते हैं और इस संस्कार के अंतर्गत गुरु-शिष्य को यज्ञोपवीत धारण करवाता है, ताकि शिष्य एक अनुशासन से आबद्ध हो सके. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है स्वाध्याय का. इसी दिन गुरु शिष्य को विद्दा का दान देना आरंभ करते हैं और श्रावणी पर्व पूर्ण सार्थक होता है. हालांकि अब इस उपाकर्म के दृश्य अब दिखाई देना लगभग बंद हो चुके हैं.


आज जब बाजार में बिकती बेहद खूबसूरत राखियों की एक लंबी श्रृंखला मौजूद है, तब यह जानना जरूरी है कि पुराने दौर में राखियाँ कैसी हुआ करती थीं और यह पर्व कैसे मनाया जाता था. पुराने दौर में घर की महिलाएँ किसी नए सूती या रेशमी कपड़े के एक हिस्से में कुछ चावल रखकर उसे सूत में बांधकर छोटी-छोटी पोटलियाँ बना दिया करती थीं, फिर इन्हें हल्दी या केसर से रंग दिया जाता था. घर के आँगन को गोबर से ल लीपकर चावल से चौक बनाया जाता था और उस पर एक घट की स्थापना की जाती थी. पूजन के बाद ब्राह्मण अपने यजमान को और बहनें अपने भाइयों को वही चावल की छोटी सी पोटली वाली राखियाँ बांधा करती थी.


बीते दौर की बात करते हुए जब हम वर्तमान का स्पर्श करते हैं, तो लगता है कि इस आधुनिक दौर में भी आज हमारे सामने जो परिस्थितियाँ हैं, उसमें कुछ विवशताएँ पुराने दौर की तरह साकार हो उठी हैं. एक दौर था, जब ससुराल में स्त्रियाँ इंतजार करती थीं कि कब सावन आए और वे मायके जा सकें. अमीर खुसरो साहब ने उनकी इस भावना को अपनी कविता में बखूबीबखान किया है:


अम्मा मेरे बाबा को भेजो री,

कि सावन आया सावन रीI

बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,

अम्मा मेरे भैया को भेजो रीI

बेटी तेरा भैया तो बाला री,

कि सावन आया सावन रीI


बेटी मायके जाना चाहती है, लेकिन उसकी विवशता है कि पिता बूढ़ा हो चुका है और भाई अभी छोटा है. ऐसे में बेटी मायके नहीं जा पाती तो उसकी आँखें सावन की तरह बरस उठती हैं. आधुनिक दौर में वह विवशता तो नहीं है, लेकिन अब जब लॉकडाउन का दौर है और एक महामारी ने बहुत सारे रास्ते बंद कर रखे हैं, तब इस सावन में न जाने कितनी बेटियां हैं, जिनके मन में पीड़ा है कि वे अपने भाइयों की कलाई पर इस वर्ष राखी नहीं बाँध पाएंगी. यह देखकर यही लग रहा है कि कुछ विवशताएँ अब भी वैसी ही हैं और सावन की नमी कई आँखों को शायद इस वर्ष कुछ अधिक ही भिगो जाए.


वैसे तो रक्षा बन्धन या श्रावणी पर्व में धर्म और संस्कृति भी अपनी नमी से हृदय को भिगोते हैं और इसमें प्रकृति भी अपना मुखर हरित सौन्दर्य उड़ेल देती है. प्रायश्चित, संस्कार, ज्ञान, प्रेम,स्नेह,श्रद्धा, विश्वास, स्मृति, आनन्द और उत्सव के अनेक रंग संजोए यह पर्व भारतीयता के उसी अमर गीत का एक हिस्सा है, जो गीत यदि किसी ह्रदय में गूंजता है तो वह हृदय कभी सूखा नहीं रहता. संवेदना की नमी उसे श्रावण की पूर्णता का पर्व सदैव सौंपती रहती है और कोई सूत या कोई रेशम का धागा उसे बन्धन में मुक्ति का अर्थ भी सहज ही समझा देता है. सदा-सदा के लिए. जन्म-जन्मान्तर के लिए   


रविवार, 2 अगस्त 2020

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Manoj kumar

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रक्षाबंधन 

रक्षाबंधन भावनाओं से जुड़ा पर्व है. आज के सन्दर्भ में एक-दूसरे की रक्षा का भाई-बहन का वादा क्या महज रक्षासूत्र बांधने से पूरा हो सकता है? इस पारंपरिक उत्सव में दिखाना इसे खोखला बना रहा है.....

हम बहुत उत्सवधर्मी हो गए हैं. दिखावे के चक्कर में सब कुछ अंदर से खोखला हो जाता है. मुझे लगता है कि गंभीरता से हाथ में धागा बाँध देने और एक ऐसा छोटा सा प्रतीकात्मक उपहार दे देने, जो उसके जीवन में ज्यादा महत्त्व रखता है, से रक्षाबंधन की परंपरा निभाई जा सकती है. प्रतीक का  जवाब तो प्रतीक ही होगा न. शान-शौकत दिखाने का कोई मतलब नहीं होता.


भावनात्मक संरक्षण मिलता है :


जब भी आप किसी से स्नेह करते हैं तो दोनों तरफ से संरक्षण मिलता है विशेष रूप से भावनात्मक. भाई-बहन दोनों एक-दूसरे को संरक्षण देते हैं. रक्षा का मतलब भावनात्मक संरक्षण से ज्यादा है. अब वह सामंती समय तो रहा नहीं कि घोड़ा पर सवार होकर लोग आपकी रक्षा करेंगे. अब तो हम सब स्त्रियों को अपनी सुरक्षा खुद करनी है. अपने भीतर ही वह तेजस्विता अर्जित करनी है कि हम ही सभी की सुरक्षा के लायक हो सके और अपनी सुरक्षा तो करें ही. मुझे लगता है कि रक्षाबंधन का स्वरूप बदलना चाहिए. भावनात्मक सुरक्षा यदि भाई बहन को देता है तो बहन भी भाई को देती है.


बहन भी रक्षा करती है भाई की :


जब से कानून बदले हैं और संपत्ति का अधिकार बहनों को मिलने लगा तब से मैंने देखा है कि भाई-बहन के रिश्तों में एक तनाव सा आ गया है. मध्यवर्गीय परिवारों में बांटने के लिए सिर्फ एक घर ही होता है और बहन नहीं चाहती कि इसमें दखल दें, लेकिन उन्हें ससुराल में ताने सुनने को मिलते हैं. जितने आसानी से कानून बनते हैं उतनी आसानी से सामाजिक मान्यताएं नहीं बदलती.यहाँ हर स्त्री को अपने भाई को बचाने की जरूरत पड़ती है और वे ऐसा ही करती है. मुझे लगता है कि माता-पिता को अपनी बच्ची के नाम पर घर में एक कोना जरूर रखना चाहिए ताकि वह कभी भी आए तो स्वाभिमान के साथ रह सके. उसे एक जगह मिले. यह संरक्षण ही होगा.


शिक्षा ही रक्षासूत्र है :


जब बहनों को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता था तो उन्हें इन्हीं माध्यमों से थोड़ा-थोड़ा करके कुछ उपहारस्वरूप देते थे. अब भाई-बहन बराबरी से उपहार ले जाते हैं. बराबरी का रिश्ता बन गया है जिसकी हमें नए सिरे से व्याख्या करनी पड़ेगी. सबसे बड़ा संरक्षण का धागा शिक्षा हिया. शिक्षा का सूत्र पहनकर जो बहनें जीवन में कदम बढ़ाती हैं वे ही भाइयों का मान रखने की कोशिश कर रही हैं. कोई भी चीज परस्पर हो तो ज्यादा अच्छी होती है. दोनों ही एक-दूसरे के लिए प्रतिबद्ध हों. शिक्षा ही रक्षासूत्र है.